🎯Target With Rudra 🎯📖 आज का विषय 📖 सिंधु घाटी सभ्यता (3300-1700 ई.पू.) ©️ Rudra Coaching Classes ™️ 👤 Rudra Tripathi ✍️ 📞 9️⃣4️⃣5️⃣3️⃣7️⃣8️⃣9️⃣6️⃣0️⃣8️⃣



सिंधु घाटी सभ्यता (3300-1700 ई.पू.)






सिंधु घाटी सभ्यता (3300-1700 ई.पू.) विश्व की प्राचीन नदी घाटी सभ्यताओं में से एक प्रमुख सभ्यता थी. यह हड़प्पा सभ्यता और सिंधु-सरस्वती सभ्यता के नाम से भी जानी जाती है. इसका विकास सिंधु और घघ्घर/हकड़ा (प्राचीन सरस्वती) के किनारे हुआ. मोहनजोदड़ो, कालीबंगा, लोथल, धोलावीरा, राखीगढ़ी और हड़प्पा इसके प्रमुख केंद्र थे.


रेडियो कार्बन c14 जैसी विलक्षण-पद्धति के द्वारा सिंधु घाटी सभ्यता की सर्वमान्य तिथि 2350 ई पू से 1750 ई पूर्व मानी गई है.


सिंधु सभ्यता की खोज रायबहादुर दयाराम साहनी ने की.


सिंधु सभ्यता को प्राक्ऐतिहासिक (Prohistoric) युग में रखा जा सकता है.


इस सभ्यता के मुख्य निवासी द्रविड़ और भूमध्यसागरीय थे.


सिंधु सभ्यता के सर्वाधिक पश्चिमी पुरास्थल सुतकांगेंडोर (बलूचिस्तान), पूर्वी पुरास्थल आलमगीर ( मेरठ), उत्तरी पुरास्थल मांदा ( अखनूर, जम्मू कश्मीर) और दक्षिणी पुरास्थल दाइमाबाद (अहमदनगर, महाराष्ट्र) हैं.


सिंधु सभ्यता सैंधवकालीन नगरीय सभ्यता थी.  सैंधव सभ्‍यता से प्राप्‍त परिपक्‍व अवस्‍था वाले स्‍थलों में केवल 6 को ही बड़े नगरों की संज्ञा दी गई है. ये हैं: मोहनजोदड़ों, हड़प्पा, गणवारीवाला, धौलवीरा, राखीगढ़ और कालीबंगन.


हड़प्पा के सर्वाधिक स्थल गुजरात से खोजे गए हैं.


लोथल और सुतकोतदा-सिंधु सभ्यता का बंदरगाह था.


जुते हुए खेत और नक्काशीदार ईंटों के प्रयोग का साक्ष्य कालीबंगन से प्राप्त हुआ है.


मोहनजोदड़ो से मिले अन्नागार शायद सैंधव सभ्यता की सबसे बड़ी इमारत थी.


मोहनजोदड़ो से मिला स्नानागार एक प्रमुख स्मारक है, जो 11.88 मीटर लंबा, 7 मीटर चौड़ा है.


अग्निकुंड लोथल और कालीबंगा से मिले हैं.


मोहनजोदड़ों से प्राप्त एक शील पर तीन मुख वाले देवता की मूर्ति मिली है जिसके चारो ओर हाथी, गैंडा, चीता और भैंसा थे.


हड़प्पा की मोहरों में एक ऋृंगी पशु का अंकन मिलता है.


मोहनजोदड़ों से एक नर्तकी की कांस्य की मूर्ति मिली है.


मनके बनाने के कारखाने लोथल और चन्हूदड़ों में मिले हैं.


सिंधु सभ्यता की लिपि भावचित्रात्मक है. यह लिपि दाई से बाईं ओर लिखी जाती है.


सिंधु सभ्यता के लोगों ने नगरों और घरों के विनयास की ग्रिड पद्धति अपनाई थी, यानी दरवाजे पीछे की ओर खुलते थे.


सिंधु सभ्यता की मुख्य फसलें थी गेहूं और जौ.


सिंधु सभ्यता को लोग मिठास के लिए शहद का इस्तेमाल करते थे.


रंगपुर और लोथल से चावल के दाने मिले हैं, जिनसे धान की खेती का प्रमाण मिला है.


सरकोतदा, कालीबंगा और लोथल से सिंधुकालीन घोड़ों के अस्थिपंजर मिले हैं.


तौल की इकाई 16 के अनुपात में थी.


सिंधु सभ्यता के लोग यातायात के लिए बैलगाड़ी और भैंसागाड़ी का इस्तेमाल करते थे.


मेसोपोटामिया के अभिलेखों में वर्णित मेलूहा शब्द का अभिप्राय सिंधु सभ्यता से ही है.


हड़प्पा सभ्यता का शासन वणिक वर्ग को हाथों में था.


सिंधु सभ्यता के लोग धरती को उर्वरता की देवी मानते थे और पूजा करते थे.


पेड़ की पूजा और शिव पूजा के सबूत भी सिंधु सभ्यता से ही मिलते हैं.


स्वस्तिक चिह्न हड़प्पा सभ्यता की ही देन है. इससे सूर्यपासना का अनुमान लगाया जा सकता है.


सिंधु सभ्यता के शहरों में किसी भी मंदिर के अवशेष नहीं मिले हैं.


सिंधु सभ्यता में मातृदेवी की उपासना होती थी.


पशुओं में कूबड़ वाला सांड, इस सभ्यता को लोगों के लिए पूजनीय था.


स्त्री की मिट्टी की मूर्तियां मिलने से ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है कि सैंधव सभ्यता का समाज मातृसत्तात्मक था.


सैंधव सभ्यता के लोग सूती और ऊनी वस्त्रों का इस्तेमाल करते थे.


मनोरंजन के लिए सैंधव सभ्यता को लोग मछली पकड़ना, शिकार करना और चौपड़ और पासा खेलते थे.


कालीबंगा एक मात्र ऐसा हड़प्पाकालीन स्थल था, जिसका निचला शहर भी किले से घिरा हुआ था.


सिंधु सभ्यता के लोग तलवार से परिचित नहीं थे.


पर्दा-प्रथा और वैश्यवृत्ति सैंधव सभ्यता में प्रचलित थीं.


शवों को जलाने और गाड़ने की प्रथाएं प्रचलित थी. हड़प्पा में शवों को दफनाने जबकि मोहनजोदड़ों में जलाने की प्रथा थी. लोथल और कालीबंगा में काफी युग्म समाधियां भी मिली हैं.


सैंधव सभ्यता के विनाश का सबसे बड़ा कारण बाढ़ था.


आग में पकी हुई मिट्टी को टेराकोटा कहा जाता है। 




          



सिन्धु घाटी सभ्यता में लोग पत्थर के औज़ारों का काफी उपयोग करते थे, इसके साथ-साथ वे कई धातुओं से भी परिचित थे, इसमें कांसा धातु प्रमुख थी। ताम्बे और टिन के मिश्रण ने कांस्य धातु का निर्माण किया जाता हूँ। सिन्धु घाटी सभ्यता में कला व शिल्प काफी विकसित था, कई स्थानों से उत्तम कलाकृतियों की प्राप्त हुई है। सिन्धु घाटी सभ्यता में बर्तन का निर्माण, मूर्तियों का निर्माण व मुद्रा का निर्माण इत्यादि प्रमुख शिल्प थे।

सिन्धु घाटी सभ्यता में कांस्य कलाकृतियाँ, मृणमूर्तियाँ, मनके की वस्तुएं व मुहरें प्राप्त हुई हैं। मनकों का निर्माण कार्नेलियन, जेस्पर, स्फटिक, क्वार्टज़, ताम्बे, कांसे, सोने, चांदी, शंख, फ्यांस इत्यादि का उपयोग किया गया था। सिन्धु घाटी सभ्यता के लोग नाव निर्माण की कला भी जानते थे। औज़ार, हथियार, गहने व बर्तनों के निर्माण के लिए ताम्बा और कांसा धातु का इस्तेमाल किया जाता था। सिन्धु घाटी सभ्यता से फलक, बाट व मनके प्राप्त हुए हैं। मोहनजोदड़ो से हाथ से बुने हुए सूती कपडे का एक टुकड़ा मिला है। उत्तर प्रदेश के आलमगीर मिट्टी की नांद पर बुने हुए वस्त्र के चिह्न मिले हैं। सिन्धु घाटी सभ्यता में नाव के उपयोग के साक्ष्य भी मिले हैं। भारत चांदी की खोज सबसे पहले सिन्धु घाटी सभ्यता में की गयी थी।

मिट्टी से निर्मित बर्तन

मिट्टी से बने बर्तनों को मृदभांड कहा जाता है। सिन्धु घाटी सभ्यता से प्राप्त मृदभांड कुम्हार की चाक से निर्मित हैं। इन बर्तनों पर गाढ़ी लाल चिकनी मिट्टी से सुन्दर चित्र बनाये गए हैं।सिन्धु घाटी सभ्यता में बर्तनों पर वृत्त, वृक्ष तथा मनुष्य की चित्रकारी देखने को मिलती है।

सिन्धु घाटी सभ्यता में बड़ी संख्या में टेराकोटा (पकी हुई मिट्टी) की मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं।चहूंदड़ो और लोथल में मनके बनाने का कार्य किया जाता था। चहूंदड़ो से सेलखड़ी की मुहरें प्राप्त हुई हैं, बालाकोट और लोथल में सीप उद्योग स्थित था। मिट्टी के बर्तनों में एकरूपता थी, कई बर्तनों पर मुद्रा के निशान भी प्राप्त हुए हैं। संभवतः उन बर्तनों का व्यापार भी होता था।

मिट्टी से निर्मित मूर्तियाँ

सिन्धु घाटी सभ्यता में प्राप्त अधिकतर मृणमूर्तियाँ पकी मिटटी से बनी हैं। मिट्टी से बनी मूर्तियों का उपयोग खिलौने के रूप में किया जाता था, यह मूर्तियाँ पूजा की प्रतिमा के रूप में भी बनायीं जाती थी। मिट्टी से बनी मूर्तियों को मृणमूर्तियाँ कहा जाता है। हड़प्पा संस्कृति में मनुष्य के अलावा पशु और पक्षियों, बैल, भैंसा, भेड़, बकरी, बाघ, सूअर, गैंडा, भालू, मोर, बन्दर, तोता, बतख और कबूतर की मृणमूर्तियाँ भी प्राप्त हुई हैं। मानव की मृणमूर्तियाँ ठोस हैं जबकि पशुओं की मृणमूर्तियाँ अन्दर से खोखली हैं।

धातु से बनी मूर्तियाँ

मोहनजोदड़ो, लोथल, कालीबंगा और चंहूदड़ो से धातु से बनी मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं।मोहनजोदड़ो से एक कांसे से बनी नर्तकी की मूर्ति प्राप्त हुई है, इसके गले में कंठहार है और हाथों में चूड़ियाँ व कंगन हैं।

पत्थर से बनी मूर्तियाँ

मोहनजोदड़ो से पत्थर से निर्मित एक पुजारी की मूर्ति प्राप्त हुई है, इस मूर्ति की मूछें नहीं हैं परन्तु दाढ़ी है। मूर्ति के बांयें कंधे पर शाल बनायीं गयी है।इस मूर्ति की आँखे आधी खुली हुई हैं, निचले होंठ मोटे, और उसकी नज़र नाक के अगले हिस्से पर टिकी हुई है। सिन्धु घाटी सभ्यता में एक संयुक्त पशु की मूर्ति भी प्राप्त हुई है, जिसका शरीर भेड़ का सिर हाथी का है। महाराष्ट्र के दैमाबाद से ताम्बे का रथ चलाता मनुष्य, सांड, गैंडा और हाथी की मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं।


मुहरें

सिन्धु घाटी क्षेत्र के काफी मात्रा में मुहरें प्राप्त हुई हैं, सिन्धु घाटी के अध्ययन में मुहरों की भूमिका अति महत्वपूर्ण है। यहाँ से कई राज्यों व अन्य देशों की मुहरें प्राप्त हुई हैं। इन मुहरों से सिन्धु घाटी सभ्यता के विदेशी व्यापार और अन्य क्षेत्रों के साथ संबंधों के बारे में पता चलता है।सिन्धु घाटी से विभिन्न प्रकार की मुहरें प्राप्त हुई हैं, यह मुहरें बेलनाकार, वर्गाकार, आयताकार, और वृत्ताकार रूप में प्राप्त हुई हैं। यहाँ पर सिन्धु घाटी की मुहरों के अलावा उन क्षेत्रों की मुहरों भी मिली हैं जिनसे सिन्धु घाटी सभ्यता के लोग व्यापार करते थे। यहाँ पर मेसोपोटामिया और दिलमुन की मुहरें भी प्राप्त हुई हैं। यह मुहरें स्टेटाइट, फ्यांस, गोमेद, चर्ट और मिट्टी की बनी हुई हैं।

सिन्धु घाटी सभ्यता से प्राप्त अधिकतर मुहरों पर अभिलेख, एक सींग वाला बैल, भैंस, बाघ, गैंडा, हिरण, बकरी व हाथ के चित्र अंकित हैं। इनमे सर्वाधिक आकृतियाँ एक सींग वाले बैल की हैं।मोहनजोदड़ो, लोथल और कालीबंगा से राजमुन्द्रक प्राप्त हुए हैं, प्राप्त मुहरें में से सर्वाधिक मुहरें चौकोर हैं। सबसे ज्यादा मुहरें मोहनजोदड़ो से प्राप्त हुई हैं, इन मुहरों पर शेर, ऊँट और घोड़े का चित्रण नहीं हैं। मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक मुहर पशुपति शिव की आकृति बनी हुई है। मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक अन्य मुहर पर पीपल की दो शाखाओं के बीच निर्वस्त्र स्त्री का चित्र अंकित है।





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टिड्डियों के बारे में मुख्य तथ्य...



भारत में टिड्डियों का हमला: रेगिस्तानी टिड्डियों के एक बड़े झुंड ने अपनी भूख को संतुष्ट करने के लिए फसलों और हरियाली की तलाश में पाकिस्तान के रास्ते से भारत के राजस्थान राज्य में प्रवेश किया है. वर्ष 2019 में ईरान से ये टिड्डियों के झुंड आये, जो पाकिस्तान में चले गए थे और अब भारत के राजस्थान, पंजाब, गुजरात और मध्य प्रदेश में प्रवेश कर गए हैं. ये रेगिस्तानी टिड्डियां पहले भी उत्तर और मध्य भारत के क्षेत्रों को प्रभावित कर चुकी हैं और धीरे-धीरे दिल्ली, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र की ओर बढ़ रही हैं.
जबकि भारत पहले से ही अपनी अर्थव्यवस्था पर नोवल कोरोना वायरस के हानिकारक परिणामों से जूझ रहा है, टिड्डियों का यह हमला/ विपत्ति हमारी कृषि अर्थव्यवस्था को और अधिक बर्बाद कर सकते हैं और भारत की खाद्य सुरक्षा को जोखिम में डाल सकते हैं. पिछले तीन दशकों में यह अब तक का सबसे ख़तरनाक हमला है. टिड्डी चेतावनी संगठन ने इन टिड्डियों के झुंड को मारने के लिए राजस्थान में रसायनों के छिड़काव के लिए ड्रोन के उपयोग का सुझाव दिया है.
आइए अब कुछ ऐसे महत्वपूर्ण सवालों पर एक नज़र डालते हैं जिनसे टिड्डियों के बारे में हर बात का जवाब मिल सकता है:
टिड्डियों के बारे में मुख्य तथ्य
रेगिस्तानी टिड्डियां सबसे खतरनाक प्रवासी कीटों में से एक हैं.

ये टिड्डियों के झुंड अपने रास्ते में आने वाले सभी क्षेत्रों, विशेष रूप से हरे क्षेत्रों को, नुकसान पहुंचाने और चट करने के लिए जाने जाते हैं.
रेगिस्तानी टिड्डियां आमतौर पर विशाल झुंडों में चलती हैं और प्रत्येक झुंड में प्रत्येक वर्ग किलोमीटर में 150 मिलियन टिड्डियां होती हैं.
प्रश्न 1. रेगिस्तानी टिड्डियां क्या हैं?
उत्तर: रेगिस्तानी टिड्डियां टिड्डी परिवार की प्रजातियों में से एक है और इसे वैज्ञानिक तौर पर शिस्टोसेरका ग्रीगेरिया (फोर्स्कल) के नाम से जाना जाता है. ये विशाल झुंडों में चलते हैं और अत्यधिक गतिशील होते हैं.
प्रश्न 2. टिड्डियां कैसी दिखती हैं?
उत्तर: ये टिड्डियां अन्य टिड्डियों की तरह ही दिखती हैं और प्रकृति में छोटे-सींग वाले, अनुकूलक और प्रवासी होने के कारण उनसे भिन्न होते हैं.
प्रश्न 3. टिड्डी का जीवन काल कितना होता है?
उत्तर: एक टिड्डी का जीवनकाल सिर्फ 90 दिन का होता है.
प्रश्न 4. ये टिड्डियां क्या खाती हैं?
उत्तर: रेगिस्तानी टिड्डियां अतृप्त खाने भक्षक होती हैं; वे एक दिन में अपने शरीर के वजन के बराबर भोजन खाती हैं. वे हरे और पत्तेदार पौधे, खेत, हरी फसलें और चारागाह को अपना भोजन बना लेती हैं. वे केवल दिन के समय ही अपना आहार खाती हैं.
उत्तर: ये टिड्डियां उपयुक्त मौसम और क्षेत्रों में प्रजनन करती हैं. वे बहुत ही उच्च प्रजनन क्षमता के साथ प्रजनन करती हैं. ये टिड्डियां केवल 3 प्रजनन मौसमों में अपनी जनसंख्या में 16000 गुना वृद्धि कर लेती हैं.
उत्तर: टिड्डियों के एक विशाल समूह को टिड्डी झुंड के रूप में जाना जाता है. जब ये टिड्डियां झुंड में फसलों पर हमला करती हैं और कृषि अर्थव्यवस्था को बिगाड़ देती हैं और इसे टिड्डी विपत्ति/ प्लेग के रूप में जाना जाता है.
प्रश्न 7. क्या टिड्डियां हानिकारक या खतरनाक होती हैं?
उत्तर: हां, टिड्डियां फसलों और खाद्य पदार्थों की सुरक्षा के लिए हानिकारक हैं. अन्यथा, ये हानिरहित कीट हैं.
उत्तर: कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय, विदेश मंत्रालय, गृह मंत्रालय, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय, नागरिक उड्डयन मंत्रालय और अन्य हितधारक जैसे राज्य सरकारें और किसान टिड्डी नियंत्रण संबंधी कार्यों में शामिल होते हैं.

हैप्पीनेस करिकुलम क्या है? दिल्ली के सरकारी स्कूल पहुंचीं मेलानिया ट्रम्प


अमेरिका की प्रथम महिला मेलानिया ट्रम्प दक्षिण दिल्ली स्थित नानकपुरा स्कूल पहुंचीं जहां उन्होंने हैप्पीनेस क्लास का जायजा लिया.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की पत्नी मेलानिया ट्रम्प ने 25 फरवरी 2020 को दिल्ली के एक सरकारी स्कूल का दौरा किया. वे दिल्ली सरकार द्वारा सरकारी स्कूलों में चलाये जा रहे ‘हैप्पीनेस करिकुलम’ को जानने के लिए इस स्कूल में आईं थीं.

अमेरिका की प्रथम महिला दक्षिण दिल्ली स्थित नानकपुरा स्कूल पहुंचीं जहां उनका माथे पर टीका लगाकर स्वागत किया गया. इसके बाद उन्होंने स्कूल की हैप्पीनेस क्लास में शिरकत की. यह दिल्ली सरकार द्वारा आरंभ किया गया एक विशेष पाठ्यक्रम है जिसमें बच्चों को रूटीन शिक्षा के अलावा दिलचस्प तरीके से शिक्षा प्रदान की जाती है.
क्या है हैप्पीनेस क्लास?👇🇮🇳
यह दिल्ली सरकार द्वारा सरकारी स्कूलों में लागू किया गया विशेष कार्यक्रम है जिसके तहत नर्सरी से आठवीं तक के बच्चों को रोजाना पहला पीरियड यानी 40 मिनट में हैप्पीनेस पर ध्यान दिया जाता है. हैप्पीनेस करिकुलम के तहत बच्चों को मेडिटेशन कराया जाता है, ज्ञानवर्धक और नैतिकता संबंधित कहानियां सुनाई जाती हैं. उन्हें गेम्स खिलाये जाते हैं या एनी ज्ञानवर्धक जानकारी दी जाती है.
हैप्पीनेस क्लास का उद्देश्य बच्चों को भावनात्मक रूप से मजबूत बनाना है. इस क्लास की शुरुआत पांच मिनट के मेडिटेशन से होती है. विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार की क्लास से बच्चों का स्कूल की ओर रुझान बढ़ता है साथ ही उनमें गुस्सा, द्वेष और ईर्ष्या जैसे नकारात्मक भावनाओं से बचाया जा सकता है.
हैप्पीनेस क्लास में मेलानिया ट्रम्प👇🇮🇳

मेलानिया ट्रम्प ने अपने इस दौरे में हैप्पीनेस क्लास के प्रति विशेष रुचि दिखाई थी. उन्होंने इस क्लास में भाग लेने के बाद कहा कि हैप्पीनेस क्लास में पाठ्यक्रम बहुत रुचिकर है और ऐसे कार्यक्रम दुनिया के प्रेरणा बन सकते हैं. उन्होंने कहा कि यहां के लोग बहुत मिलनसार और दयालू हैं तथा उन्हें दिल्ली के इस स्कूल में आकर ख़ुशी मिली है. इस दौरान उन्होंने बच्चों से बातें भी कीं और पाठ्यक्रम का जायजा भी लिया.
दिल्ली के मुख्यमंत्री ने एक ट्वीट करके अपनी ख़ुशी जाहिर की उन्होंने कहा कि उन्हें गर्व है कि मेलानिया ट्रम्प सरकारी स्कूल में गईं. भारत ने विश्व को अध्यात्म की शिक्षा दी है. मेलानिया ट्रम्प यहां से ख़ुशी का सन्देश लेकर जायेंगी.

भारत-अमेरिका के मध्य 3 बिलियन डॉलर के रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर


भारत और अमेरिका के मध्य तीन बिलियन डॉलर के रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किये गये. इस समझौते पर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने हस्ताक्षर किये. 

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 25 फरवरी 2020 को एक बड़े रक्षा सौदे पर हस्ताक्षर किये. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार दोनों देशों ने लगभग 3 बिलियन डॉलर के रक्षा सौदे पर हस्ताक्षर किये हैं. यह समझौता दोनों देशों के नेताओं के बीच हुई द्विपक्षीय वार्ता के बाद किया गया.

इसके बाद दोनों नेताओं ने आतंकवाद के विरुद्ध कड़ी करवाई की प्रतिबद्धता को दोहराया. राष्ट्रपति ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी और भारत-अमेरिका के रिश्तों की मजबूती का जिक्र किया. डोनाल्ड ट्रंप ने अपने संबोधन में कहा कि वे भारत के इस दौरे को हमेशा याद रखेंगे तथा उन्होंने भारतीयों द्वारा किये गये शानदार स्वागत के लिए सभी को धन्यवाद भी कहा.

भारत-अमेरिका रक्षा सौदा👇🇮🇳
भारत और अमेरिका के मध्य तीन बिलियन डॉलर के रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किये गये. इस समझौते पर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने हस्ताक्षर किये. इस समझौते में अमेरिका के 23 एमएच 60 रोमियो हेलिकॉप्टर और छह एएच 64ई अपाचे हेलिकॉप्टर की खरीद शामिल है. द्विपक्षीय वार्ता के बाद जारी किये गये संयुक्त बयान में डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि इस सौदे से दोनों देशों के बीच रक्षा संबंध पहले से अधिक मजबूत हो सकेंगे. गौरतलब है कि यह दोनों हेलिकॉप्टर किसी भी प्रकार के मौसम में तथा दिन या रात में से कभी भी हमला करने में सक्षम हैं. चौथी पीढ़ी वाला अपाचे हेलिकॉप्टर छिपी हुई पनडुब्बियों को निशाना बना सकता है.

डोनाल्ड ट्रम्प ने क्या कहा?👇🇮🇳
द्विपक्षीय वार्ता के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने संबोधन में कहा कि भारत और अमेरिका के मध्य ड्रग तस्करी, नार्को-आतंकवाद और संगठितत अपराध जैसी गंभीर समस्याओं के बारे में एक नए मेकैनिज्म पर भी सहमति हुई है. उन्होंने कहा कि दोनों देशों ने आतंक के खिलाफ अपने प्रयासों को और बढ़ाने का निश्चय किया है. उन्होंने यह भी कहा कि दोनों देश आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ने पर सहमत हैं.
द्विपक्षीय वार्ता के बाद संयुक्त संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारत और अमेरिका के मध्य विशेष संबंध का सबसे महत्वपूर्ण आधार लोगों से संपर्क करने वाले लोग हैं. इनमें पेशेवर लोग, छात्रों, संयुक्त राज्य अमेरिका में भारतीय प्रवासी का महत्वपूर्ण योगदान है. इस दौरान पीएम मोदी ने कहा कि हमारे वाणिज्य मंत्रियों ने व्यापार पर सकारात्मक बातचीत की है. हम दोनों ने फैसला किया है कि हमारी टीमों को इन व्यापार वार्ता को कानूनी रूप देना चाहिए. हम एक बड़े व्यापार सौदे पर बातचीत आरंभ करने के लिए भी सहमत हुए हैं.

कैथरीन जॉनसन, प्रसिद्ध नासा गणितज्ञ, का 101 वर्ष की उम्र में निधन


कैथरीन जॉनसन अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा के उस कंप्यूटर पूल का एक प्रमुख भाग थीं जिन्होंने अपोलो मिशन के माध्यम से मनुष्य को चाँद तक पहुंचाया.


नासा की प्रसिद्ध गणितज्ञ कैथरीन जॉनसन का हाल ही में निधन हो गया. वे 101 वर्ष की थीं. कैथरीन को नासा के मानव मिशन की गणनाओं के लिए जाना जाता है. कैथरीन ने नासा के शुरुआती मानव मिशन के लिए गणनाएं की थीं जिससे नासा के अभियानों को आसानी से पूरा किया जा सका.

कैथरीन जॉनसन के बारे में जानकारी👇🇮🇳

कैथरीन जॉनसन अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा के कंप्यूटर पूल का एक प्रमुख भाग थीं. इस पूल को गणितज्ञों के एक समूह के रूप में जाना जाता था. नासा का यह कंप्यूटर पूल प्रत्येक अभियान के लिए डेटा जारी करता है तथा गणनाओं के आधार पर मिशन की रूपरेखा तैयार करता है. नासा ने इसी कंप्यूटर पूल की मदद से अपने पहले मानव अंतरिक्ष अभियान को सफल बनाया था. कैथरीन जॉनसन इसी पहले मानव मिशन के कंप्यूटर पूल का हिस्सा थीं. कैथरीन ने अपने करियर की शुरुआत एक शिक्षक के रूप में की थी.
उनका जन्म 1918 में वेस्ट वर्जीनिया में हुआ था, उन्हें बचपन से ही गणित में विशेष रुचि थी. नासा द्वारा प्रकाशित कैथरीन के बायोडेटा के अनुसार, वह वेस्ट वर्जीनिया की उन प्रतिभाशाली अश्वेत छात्रों में से थीं जिन्हें गणित और विज्ञान के लिए सबसे पहले शुरु की गई स्कॉलरशिप के लिए चुना गया था. उनहोंने 1969 में अपोलो-13 के चंद्रमा पर उतरने से पहले और अंतरिक्ष यात्रियों को वापस पृथ्वी पर लाने में अपनी गणनाओं से मदद की थी.
कैथरीन के जीवन पर वर्ष 2016 में हॉलीवुड फिल्म ‘द हिडन फिगर्स’ बनाई गई थी. यह फिल्म मॉर्गन ली शेट्टरली की किताब पर ‘हिडन फिगर्स’ पर आधारित थी. फिल्म में ताराजी पी हेंसन द्वारा कैथरीन की भूमिका निभाई गई थी. फिल्म को जनवरी 2017 में स्क्रीन एक्टर्स गिल्ड अवार्ड मिला था. इस फिल्म को प्रतिष्ठित ऑस्कर की तीन श्रेणियों में भी नामांकित किया गया था. हालांकि, फिल्म ऑस्कर नहीं जीत पाई थी.

वर्ष 2015 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा द्वारा उन्हें ‘प्रेसिडेंशियल मेडल ऑफ़ फ्रीडम’ से सम्मानित किया गया. ओबामा ने कहा था कि केथरीन ने समाज के दबाव को दरकिनार करते हुए स्वयं को किसी सीमा में बांधे रखने से इनकार किया और मानवता को नई ऊँचाईयों तक पहुंचाने में मदद की है. इसके अतिरिक्त नासा ने 2017 में उनके सम्मान में 'Katherine G. Johnson Computational Research Facility' के नाम से एक बिल्डिंग उन्हें समर्पित की

सेंट्रल एक्साइज दिवस 2020: जानिए इस दिवस का महत्व और पृष्ठभूमि



हर साल 24 फरवरी को, केंद्रीय उत्पाद और सीमा शुल्क बोर्ड (CBCE) पूरे देश में केंद्रीय उत्पाद शुल्क दिवस मनाता है. इस दिवस का उद्देश्य केंद्रीय उत्पाद और कस्टम बोर्ड ऑफ इंडिया का अर्थव्यवस्था में योगदान का सम्मान करना है. इसके अतिरिक्त, केंद्रीय उत्पाद शुल्क बोर्ड, केंद्र सरकार के लिए एक प्राथमिक कर संग्रह एजेंसी होने के नाते, इस दिवस को अधिकारियों द्वारा की गई कड़ी मेहनत को सम्मानित करने के उद्देश्य से भी मनाता है.

इसके अलावा यह दिवस माल निर्माण व्यवसाय में भ्रष्टाचार की जाँच करने के लिए भी मनाया जाता है. इस दिवस को मनाने का उद्देश्य देशवासियों को केंद्रीय उत्पाद और सीमा शुल्क बोर्ड के महत्व को बताना भी है.

इस अवसर पर केंद्रीय उत्पाद और सीमा शुल्क बोर्ड देश भर में विभिन्न गतिविधियों का आयोजन करता है, जिसमें सेमिनार, कार्यशालाएं, शैक्षिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम, जागरूकता कार्यक्रम, प्रतियोगिताएं और पुरस्कार समारोह शामिल हैं. इसके अतिरिक्त, बोर्ड आम जनता को CBCE और उसके अधिकारियों की भूमिकाओं और जिम्मेदारियों को समझने में मदद करने के लिए जागरूकता कार्यक्रमों की एक श्रृंखला भी आयोजित करता है.

पृष्ठभूमि

प्रत्येक वर्ष केंद्रीय उत्पाद शुल्क दिवस को 24 फरवरी 1944 को केंद्रीय उत्पाद शुल्क और नमक अधिनियम बनाए जाने के की याद के तौर पर भी मनाया जाता है.
सीबीसीई सीमा शुल्क और केंद्रीय उत्पाद शुल्क और सेवा कर के संग्रह और इससे संबंधित नीति निर्माण का भाग है.

इसके दायरे में सीमा शुल्क, केंद्रीय उत्पाद शुल्क, सेवा कर और मादक पदार्थों से संबंधित तस्करी आदि से संबंधित मामले भी आते हैं.

बोर्ड अपने अधीनस्थ संगठनों के लिए प्रशासनिक प्राधिकरण है, जिसमें कस्टम हाउस, केंद्रीय उत्पाद शुल्क और सेवा कर आयुक्त और केंद्रीय राजस्व नियंत्रण प्रयोगशाला शामिल हैं.

Donald Trump India Visit: डोनाल्ड ट्रम्प ने 'नमस्ते ट्रम्प' में भाग लिया, अब आगरा पहुंचे



अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपनी पहली भारत यात्रा पर 24 फरवरी 2020 को अहमदाबाद, गुजरात पहुंचे. ट्रंप के साथ उनकी पत्नी मेलानिया ट्रंप, बेटी इवांका ट्रंप और वरिष्ठ सलाहाकार जेरेड कुशनेर भी आये हैं. डोनाल्ड ट्रम्प अपनी इस यात्रा के दौरान ट्रंप अहमदाबाद स्थित साबरमती आश्रम भी गये.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक रोड शो में भी भाग लिया तथा दुनिया के सबसे बड़े क्रिकेट स्टेडियम 'मोटेरा' तक गये. भारत द्वारा ट्रम्प के लिए मोटेरा स्टेडियम में 'नमस्ते ट्रंप' नामक कार्यक्रम आयोजित किया गया जहां उन्होंने लगभग एक लाख लोगों को संबोधित किया.

ट्रम्प का हिंदी में ट्वीट

डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने भारत आगमन से कुछ ही समय पूर्व हिंदी में एक ट्वीट किया है. उन्होंने लिखा, “हम भारत आने के लिए तत्पर हैं. हम रास्ते में हैँ, कुछ ही घंटों में हम सबसे मिलेंगे!” इसके जवाब में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लिखा, “अतिथि देवो भव:”.


डोनाल्ड ट्रम्प ने नमस्ते ट्रम्प कार्यक्रम में कहा कि भारत और अमेरिका कट्टरवाद के खिलाफ साथ हैं. भारत और अमेरिका आतंकवाद के खात्मे के लिए साथ रहे रहेंगे और लड़ेंगे. देश के लिए जो खतरा है उसका हल मिलकर निकालेंगे. उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका में भारतीय मूल के लोगों ने वहां के विकास में बड़ा रोल निभाया है. कहा कि अमेरिका में रहने वाले कई बिजनेसमैन गुजरात से आते हैं, ऐसे में अमेरिका के विकास में अहम भूमिका निभाने के लिए हम सभी का शुक्रिया करते हैं.
डोनाल्ड ट्रम्प के लिए भारत में ‘नमस्ते ट्रम्प’ नाम से एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया. यह कार्यक्रम उसी तर्ज पर आयोजित किया गया था जैसे अमेरिका में मोदी के आगमन पर ‘हाउडी मोदी’ का आयोजन किया गया था. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, मोटेरा क्रिकेट स्टेडियम में एक लाख से अधिक लोगों ने ‘नमस्ते ट्रम्प’ में भाग लिया.

‘नमस्ते ट्रम्प’ कार्यक्रम में डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत की जनता को संबोधित किया. मंच पर उनके साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी थे. इसके बाद ट्रम्प आगरा चले गये और अपने परिवार के साथ लगभग 45 मिनट के लिए ताजमहल का दीदार किया. इसके बाद वे दिल्ली आयेंगे.

मोदी और ट्रम्प के बीच 25 फरवरी 2020 को द्विपक्षीय वार्ता होगी. डोनाल्ड ट्रम्प इस यात्रा के दौरान किसी व्यापारिक समझौते से इनकार कर चुके हैं लेकिन इस वार्ता में किसी बड़ी घोषणा के भी कयास लगाए जा रहे हैं. गौरतलब है कि वर्ष 2018-2019 में भारत और अमेरिका के मध्य होने वाला कारोबार चीन-अमेरिका के व्यापार की तुलना में करीब एक अरब ज्यादा रहा है.

घोंघे की नई प्रजाति का नाम ग्रेटा थनबर्ग के नाम पर रखा गया


वैज्ञानिकों ने हाल ही में घोंघे की एक नई प्रजाति की खोज की है. यह प्रजाति तापमान-संवेदनशील प्रजातियों के परिवार का हिस्सा है. इसे क्रैसेपोट्रोपिस ग्रेथथुनबेर्गे (Craspedotropis gretathunbergae) नाम दिया गया है. वैज्ञानिकों ने यह नाम पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग के सम्मान में दिया है. जलवायु परिवर्तन के प्रति जागरूकता फैलाने में ग्रेटा के प्रयासों के लिए वैज्ञानिकों ने यह निर्णय लिया.

पत्रिका 'बायोडायवर्सिटी डेटा' में प्रकाशित अध्ययन में कहा गया है कि घोंघे की यह प्रजाति कैनेओगैस्ट्रोपोडा (Caenogastropoda) समूह की है. यह प्रजाति भूमि पर रहती है और सूखे, अत्यधिक तापमान में उतार-चढ़ाव और वनों की कटाई से प्रभावित हो सकती है. नीदरलैंड्स में नेचुरल बायोडायवर्सिटी सेंटर के वैज्ञानिकों द्वारा जारी जानकारी के मुताबिक घोंघे की नई प्रजाति ब्रुनेई में कुआला बेलांग फील्ड स्टडी सेंटर के करीब पाई गई.

उद्देश्य

जैव विविधता डेटा जर्नल में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, वैज्ञानिकों ने इस बात पर सर्वसम्मति से वोट किया कि प्रजातियों का नाम किसे दिया जाए. प्रतिभागी शोध और नेशनल पार्क के कर्मचारियों ने सामूहिक रूप से निर्णय लिया कि इसका नाम ग्रेटा के नाम पर रखा जाना चाहिए और अंत में इसका नाम क्रैसेपोट्रोपिस ग्रेथथुनबेर्गे रखा गया.

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छत्रपति शिवाजी महाराज: जीवनी, इतिहास और प्रशासन



छत्रपति शिवाजी महाराज निर्विवाद रूप से भारत के सबसे महान राजाओं में से एक हैं. उनकी युद्ध प्रणालियाँ आज भी आधुनिक युग में अपनायीं जातीं हैं. उन्होंने अकेले दम पर मुग़ल सल्तनत को चुनौती दी थी.

शिवाजी के बारे में तथ्यात्मक जानकारी (Factual Information about the Shivaji)

नाम: शिवाजी भोंसले

जन्म तिथि: 19 फरवरी, 1630 या अप्रैल 1627

जन्मस्थान: शिवनेरी किला, पुणे जिला, महाराष्ट्र

पिता: शाहजी भोंसले  

माता: जीजाबाई

शिवाजी महाराज, शाहजी भोंसले और जीजा बाई के पुत्र थे. उन्हें पूना में उनकी माँ और काबिल ब्राहमण दादाजी कोंडा-देव की देखरेख में पाला गया जिन्होंने उन्हें एक विशेषज्ञ सैनिक और एक कुशल प्रशासक बनाया था. 
शिवाजी महाराज, गुरु रामदास से धार्मिक रूप से प्रभावित थे, जिन्होंने उन्हें अपनी मातृभूमि पर गर्व करना सिखाया था.

17वीं शताब्दी की शुरुआत में नए योद्धा वर्ग मराठों का उदय हुआ, जब पूना जिले के भोंसले परिवार को सैन्य के साथ-साथ अहमदनगर साम्राज्य का राजनीतिक लाभ मिला था. भोंसले ने अपनी सेनाओं में बड़ी संख्या में मराठा सरदारों और सैनिकों की भर्ती की थी जिसके कारण उनकी सेना में बहुत अच्छे लड़ाके सैनिक हो गये थे.
टोरणा की विजय ने शिवाजी को रायगढ़ और प्रतापगढ़ फतह करने के लिए प्रेरित किया और इन विजयों के कारण बीजापुर के सुल्तान को चिंता हो रही थी कि अगला नंबर उसके किले का हो सकता है और उसने शिवाजी के पिता शाहजी को जेल में डाल दिया था.

पानीपत की लड़ाई किसके बीच और कब हुई?

ईस्वी 1659 में, शिवाजी ने बीजापुर पर हमला करने की कोशिश की, फिर बीजापुर के सुल्तान ने अपने सेनापति अफजल खान को 20 हजार सैनिकों के साथ शिवाजी को पकड़ने के लिए भेजा, लेकिन शिवाजी ने चतुराई से अफजल खान की सेना को पहाड़ों में फंसा लिया और बागनाख या बाघ के पंजे नामक घातक हथियार से अफजल खान की हत्या कर दी थी. 
अंत में, 1662 में, बीजापुर के सुल्तान ने शिवाजी के साथ एक शांति संधि की और उन्हें अपने विजित प्रदेशों का एक स्वतंत्र शासक बना दिया.

कोंडाना किले की विजय (Conquest of Kondana fort): यह किला नीलकंठ राव के नियंत्रण में था. इसको जीतने के लिए मराठा शासक शिवाजी के कमांडर तानाजी मालुसरे और जय सिंह प्रथम के किला रक्षक उदयभान राठौड़ के बीच युद्ध हुआ था. इस युद्ध में तानाजी मालुसरे की मौत हो गयी थी लेकिन यह मराठा यह किला जीतने में कामयाब रहे थे. इन्ही तानाजी मालसुरे के ऊपर एक फिल्म बनी है जो कि सुपरहिट हुई है.
शिवाजी का राज्याभिषेक: 1674 ई. में, शिवाजी ने खुद को मराठा साम्राज्य का स्वतंत्र शासक घोषित किया और उन्हें रायगढ़ में छत्रपति शिवाजी के रूप में ताज पहनाया गया था. उनका राज्याभिषेक मुगल सल्तनत के लिए चुनौती बन गया था.
राज्याभिषेक के बाद, उन्हें हैडवा धर्मोधरका ’(हिंदू धर्म के रक्षक) का खिताब मिला था. यह ताजपोशी लोगों को भू-राजस्व इकट्ठा करने और कर लगाने का वैध अधिकार देती है.

शिवाजी का प्रशासन (Shivaji’s Administration)
शिवाजी का प्रशासन काफी हद तक डेक्कन प्रशासनिक प्रथाओं से प्रभावित था. उन्होंने आठ मंत्रियों को नियुक्त किया जिन्हें 'अस्तप्रधान' कहा गया था, जो उन्हें प्रशासनिक मामलों में सहायता प्रदान करते थे.उनके शासन में अन्य पद थे;

1. पेशवा: सबसे महत्वपूर्ण मंत्री थे जो वित्त और सामान्य प्रशासन की देखभाल करते थे.
2. सेनापति: ये मराठा प्रमुखों में से एक थे. यह काफी सम्मानीय पद था. 
4. सुरनवीस या चिटनिस (Surnavis or chitnis): अपने पत्राचार से राजा की सहायता करते थे.
5. दबीर (Dabir): समारोहों के व्यवस्थापक थे और विदेशी मामलों से निपटने में राजा की मदद करते थे.

6. न्यायधीश और पंडितराव: न्याय और धार्मिक अनुदान के प्रभारी थे.

महाशिवरात्रि 2020: भगवान शिव से जुड़े 15 प्रतीक और उनका महत्व


हर त्योहारों का अपना ही महत्व होता है, इसी प्रकार महाशिवरात्रि का भी अपना ही एक महत्व है। एसी मान्यता है कि इस दिन शिव और पार्वती का विवाह हुआ था। इस दिन भक्त सच्चे मन से शिव जी की अराधना करते हैं, शिवलिंग का अभिषेक करते हैं। शिवलिंग पर दूध, जल और बेल पत्र चढ़ाकर शिव शंकर की पूजा करते हैं।
भगवान शिव को मृत्युलोक का देवता माना गया है। यह इकलौते ऐसे भगवान हैं, जो स्वर्ग से दूर हिमालय की सर्द चट्टानों पर अपना घर बनाये हुए हैं| क्या अपने कभी सोचा है कि आखिर भगवान शिव गले में नाग, हाथ में त्रिशूल, सिर पर गंगा, शेर की खाल क्यों पहनते हैं, इन सबके पीछे कोई न कोई कहानी जुड़ी हुई है| आइए जानते हैं कि ये कहानियां क्या हैं और क्यों ये सब भगवान शिव के प्रतीक या आभूषण हैं|

हिंदू धर्म ग्रंथ पुराणों के अनुसार भगवान शिव ही समस्त सृष्टि के आदि कारण हैं। उन्हीं से ब्रह्मा, विष्णु सहित समस्त सृष्टि का उद्भव हुआ हैं। यू कहे तो भगवान शिव दुनिया के सभी धर्मों का मूल हैं और तो और हिन्दू धर्म में भगवान शिव को मृत्युलोक का देवता माना गया है। यह इकलौते ऐसे भगवान हैं, जो स्वर्ग से दूर हिमालय की सर्द चट्टानों पर अपना घर बनाये हुए हैं| भगवान शिव अजन्मे माने जानते हैं, ऐसा कहा जाता है कि उनका न तो कोई आरम्भ हुआ है और न ही अंत होगा। इसीलिए वे अवतार न होकर साक्षात ईश्वर हैं। क्या अपने कभी सोचा है कि आखिर भगवान शिव गले में नाग, हाथ में त्रिशूल, सिर पर गंगा, शेर की खाल क्यों पहनते हैं, इन सबके पीछे कोई न कोई कहानी जुड़ी हुई है| 
1. गले में सर्प 


भगवान शिव अपने गले में सर्प धारण करते हैं| यह सर्प उनके गले में तीन बार लिपटे रहता है जो भूत, वर्तमान एवं भविष्य का सूचक है| सर्पों को भगवान शंकर के अधीन होना यही संकेत है कि भगवान शंकर तमोगुण, दोष, विकारों के नियंत्रक व संहारक हैं, जो कलह का कारण ही नहीं बल्कि जीवन के लिये घातक भी होते हैं। इसलिए उन्हें कालों का काल भी कहा जाता है| सर्प को कुंडलिनी शक्ति भी कहा गया है जोकि एक निष्क्रिय ऊर्जा है और हर एक के भीतर होती है|


भगवान शिव अपने हाथ में त्रिशूल धारण करते हैं| शिव का त्रिशूल मानव शरीर में मौजूद तीन मूलभूत नाड़ियों बायीं, दाहिनी और मध्य का सूचक है| इसके अलावा त्रिशूल इच्छा, लड़ाई और ज्ञान का भी प्रतिनिधित्व करता है| ऐसा कहा जाता है कि इन नाड़ियों से होकर ही उर्जा की गति निर्धारित होती है और गुजरती है|
4. अर्धचन्द्र
भगवान शिव अर्धचन्द्र को आभूषण की तरह अपनी जटा के एक हिस्से में धारण करते है। इसलिए उन्हें “चंद्रशेखर” या “सोम” कहा गया है| वास्तव में अर्धचन्द्र अपने पांचवें दिन के चरण में चंद्रमा बनता है और समय के चक्र के निर्माण में शुरू से अंत तक विकसित रहने का प्रतीक है। भगवान शिव के सिर पर चन्द्र का होना समय को नियंत्रण करने का प्रतीक है क्योंकि चन्द्र समय को बताने का एक माध्यम है|
उनके उलझे हुए बाल पवन या वायु का प्रवाह, जो सभी जीवित प्राणियों में मौजूद सांस का सूक्ष्म रूप है, का प्रतिनिधित्व करता है। इससे पता चलता है कि शिव पशुपतिनाथ, सभी जीवित प्राणियों के प्रभु हैं।

6. नीला गला या कंठ


शिव को नीलकंठ के नाम से भी जाना जाता है| समुद्र मंथन के दौरान जो जहर आया था उसको उन्होंने निगल लिया था| देवी पार्वती इस जहर को उनके गले में ही रोक दिया था और इस प्रकार यह नीले रंग में बदल गया। तब से उन्हें नीलकंठ कहा जाने लगा|


भगवान शिव अपने गले में रूद्राक्ष की माला पहनते है जोकि रूद्राक्ष पेड़ के 108 बीजों से मिलकर बनी है| 'रूद्राक्ष' शब्द, 'रूद्र' (जो शिव का दूसरा नाम है) और 'अक्श' (अर्थात आँसू) से बना है। इसके पीछे कहानी यह है कि जब भगवान शिव ने गहरे ध्यान के बाद अपनी आँखें खोली, तो उनकी आँख से आंसू की बूंद पृथ्वी पर गिर गयी और पवित्र रूद्राक्ष के पेड़ में बदल गया। रूद्राक्ष के मोती दुनिया के निर्माण में इस्तेमाल हुए तत्वों का प्रतिनिधित्व करते हैं| यह भी सच है कि भगवान शिव अपने ब्रह्मांडीय कानूनों के बारे में दृढ रहते है और सख्ती से ब्रह्मांड में कानून और व्यवस्था बनाए रखते है।

नाथ सम्प्रदाय की उत्पति, कार्यप्रणाली एवं विभिन्न धर्मगुरूओं का विवरण

यह एक छोटे से आकार का ड्रम है जोकि भगवान शिव के हाथ में रहता है और इसीलिए भगवान शिव को “डमरू-हस्त” कहा जाता है| डमरू के दो अलग-अलग भाग एक पतले गले जैसी संरचना से जुड़े होते हैं| डमरू के अलग-अलग भाग अस्तित्व की दो भिन्न परिस्थिति “अव्यक्त” और “प्रकट” का प्रतिनिधित्व करता है| जब डमरू हिलता है तो इससे ब्रह्मांडीय ध्वनि “नाद” उत्पन्न होता है जो गहरे ध्यान के दौरान सुना जा सकता है| हिन्दू शास्त्रों के अनुसार, “नाद” सृजन का स्रोत है। डमरू भगवान शिव के प्रसिद्ध नृत्य “नटराज” का अभिन्न भाग है, जो शिव की प्रमुख विशेषताओं में से एक है।

9. कमंडल

पानी का बर्तन (कमंडल) अक्सर भगवान से सटे हुए दिखाया जाता है| ऐसा कहा गया है कि यह एक सूखे कद्दू और अमृत से बना हुआ है। कमंडल को भारतीय योगियों और संतों की बुनियादी जरूरत की एक प्रमुख वस्तु के रूप में दिखाया जाता है। इसका एक गहरा महत्व है। जिस प्रकार से पके हुए कद्दू को पेड़ से तोड़ने के बाद उसके छिलके को हटाकर शरबत के लिए प्रयोग किया जाता है, उसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को भौतिक दुनिया से अपने लगाव को समाप्त कर अपने भीतर की अहंकारी इच्छाओं का त्याग करना चाहिए ताकि वह स्वयं के आनंद का अनुभव करने कर सके| अतः कमंडल अमृत का प्रतीक है|
भगवान के माथे पर राख की तीन लाइन विभूति के रूप में जानी जाती है। यह भगवान और उसके प्रकट होने की महिमा की अमरता का प्रतीक है।
दो कान के छल्ले, जिन्हें “अलक्ष्य” (जिसका अर्थ है "जो किसी भी माध्यम के द्वारा दिखाया नहीं जा सकता") और निरंजन (जिसका अर्थ है 'जो नश्वर आंखों से नहीं देखा जा सकता है"), भगवान द्वारा पहनें गए है| प्रभु के कानों में सुशोभित गहने दर्शाते हैं कि भगवान शिव साधारण धारणा से परे है। उल्लेखनीय है कि प्रभु के बाएं कान का कुंडल महिला स्वरूप द्वारा इस्तेमाल किया गया है और उनके दाएं कान का कुंडल पुरूष स्वरूप द्वारा इस्तेमाल किया गया है। दोनों कानों में विभूषित कुंडल शिव और शक्ति (पुरुष और महिला) के रूप में सृष्टि के सिद्धांत का प्रतिनिधित्व करते हैं।
हिन्दू पौराणिक कथाओं में कहा गया है कि बाघ शक्ति और सत्ता का प्रतीक है तथा शक्ति की देवी का वाहन है। भगवान शिव अक्सर इस पर बैठते हैं या इस खाल को पहनते है, जोकि यह दर्शाता है कि वह शक्ति के मालिक हैं और सभी शक्तियों से ऊपर हैं| बाघ ऊर्जा का भी प्रतिनिधित्व करता है| वह इस ऊर्जा का उपयोग कर इस अंतहीन सांसारिक चक्र में ब्रह्मांड परियोजना सक्रिय से चलाते है।
गंगा नदी (या गंगा) हिन्दूओं के लिए सबसे पवित्र नदी मानी जाती है। एक पौराणिक कथा के अनुसार, गंगा नदी का स्रोत शिव है और उनकी जटाओं से बहती है। भगवान पृथ्वी पर और इंसान के लिए शुद्ध पानी लाने के लिए गंगा को अपनी जटाओं में धारण करते है। इसलिए, भगवान शिव अक्सर गंगाधर या " गंगा नदी के वाहक" के रूप में जाने जाते है। गंगा नदी रूद्र के रचनात्मक पहलुओं को दर्शाती है। भगवान शिव द्वारा गंगा को धारण करना यह भी इंगित करता है कि शिव न केवल विनाश के भगवान है लेकिन वह ज्ञान, पवित्रता और भक्तों को शांति भी प्रदान करते है।

14. शिव लिंग
उम्मीद है कि इस लेख से भगवान शिव और उनके प्रतीकों के बारे में ज्ञात हुआ होगा।

महंत नृत्य गोपाल दास बने राम मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष


अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए बने ‘श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ की 19 फरवरी 2020 को पहली बैठक हुई है. इस बैठक में कई महत्वपूर्ण फैसले लिए गए. महंत नृत्य गोपाल दास को राम मंदिर ट्रस्ट का अध्यक्ष बनाया गया. वहीं, विश्व हिन्दू परिषद (वीएचपी) के उपाध्यक्ष चंपत राय को महासचिव बनाया गया.

नृपेंद्र मिश्रा को भवन निर्माण समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है. ट्रस्ट की हुई पहली बैठक में 9 प्रस्ताव भी पारित किए गए. गोविंद गिरी को मंदिर ट्रस्ट का कोषाध्यक्ष बनाया गया है. ये बैठक रामलला के वकील रहे केशवन अय्यंगर परासरण के दिल्ली के ग्रेटर कैलाश स्थित घर में हुई. बैठक में सभी मुद्दों पर चर्चा की गई.

कौन है महंत नृत्य गोपाल दास?

महंत नृत्य गोपाल दास का जन्म 11 जून 1938 को मथुरा के कहौला गॉव में हुआ था. उन्होंनें 12 साल की उम्र में ही वैराग्य धारण कर लिया और अयोध्या आ गए. वे महंत राममनोहर दास से दीक्षित थे. नृत्य गोपाल दास दशकों तक राम मंदिर आंदोलन के संरक्षक की भूमिका में रहे हैं. महंत नृत्‍य गोपाल दास साल 1984 से ही मंदिर आंदोलन से जुड़े हैं. उनकी अध्यक्षता में मंदिर कार्यशाला में राम मंदिर हेतु पत्थरों को तराशने का काम चला. विवादित ढांचा विध्वंस की घटना मे सीबीआई कोर्ट में उनपर आपराधिक धाराओं में केस भी चल रहा है. उनके मठ ‘मणिराम छावनी’ में पांच सौ साधुओं की जमात स्थाई तौर पर रहती है.

कौन है ट्रस्‍ट के महासचिव बनाए गए चंपत राय?

चंपत राय ने अपने करियर की शुरुआत भौतिक विज्ञान के प्रवक्‍ता से की. वे बिजनौर के एक कॉलेज में लेक्‍चरर भी रहे. वे इसके बाद संघ से जुड़ गए और प्रचारक की जिम्मेदारी संभाली. वे साल 1984 से वीएचपी के तत्‍कालीन अध्यक्ष अशोक सिंहल के विश्‍वासपात्र सहयोगी के रूप में मंदिर आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. वे मंदिर आंदोलन की व्यवस्था और रणनीतिकारों के तौर पर जाने जाते हैं. वे वीएचपी की राम जन्म भूमि न्यास के मंत्री भी रहे हैं. मंदिर की अयोध्या ट्रस्‍ट का वित्तीय लेखा जोखा का नियंत्रण उनके ही हाथ में रहा है.
सुप्रीम कोर्ट का फैसला

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने तीन वर्ष की अवधि के लिए 22वें भारतीय विधि आयोग के गठन को मंजूरी दी  


केंद्र सरकार ने 19 फरवरी 2020 को 22वें विधि आयोग के गठन को मंजूरी दे दी है. केंद्रीय कैबिनेट ने फैसला किया है कि इसका गठन तीन साल के लिए किया जाएगा. इससे पहले 21वें विधि आयोग का कार्यकाल 31 अगस्त 2018 को समाप्त हुआ था.

विधि आयोग एक गैर-सांविधिक निकाय है. सरकार आवश्यकता के अनुसार समय-समय पर इस आयोग का गठन करती है. इस आयोग का मूल रूप से 1955 में गठन किया गया था. आयोग का पुनर्गठन तीन साल हेतु किया जाता है.

इससे होने वाले लाभ

सरकार को विचारणीय विषयों के अनुसार अध्ययन एवं सिफारिश के लिए आयोग को सौंपे गये कानून के भिन्न-भिन्न पहलुओं के बारे में एक विशेषज्ञता प्राप्त निकाय से सिफारिशें मिलने का लाभ प्राप्त होगा. विधि आयोग केंद्र सरकार द्वारा इसे सौंपे गये या स्वतः संज्ञान पर कानून में अनुसंधान करने और उसके बारे में सुधार करने हेतु भारत के मौजूदा कानूनों की समीक्षा करने तथा नए कानून बनाने का काम करेगा. यह प्रक्रियाओं में देरी को समाप्त करने, मामलों को तेजी से निपटाने, अभियोग की लागत कम करने हेतु न्याय आपूर्ति प्रणालियों में सुधार लाने के लिए अध्ययन तथा अनुसंधान भी करेगा.
• यह ऐसे कानूनों की पहचान करेगा जिनकी अब कोई जरूरत नही है या वे अप्रासंगिक है तथा जिन्हें तुरन्त निरस्त किया जा सकता है.
• 22वें विधि आयोग मौजूदा कानूनों की जांच करेगा और सुधारों के लिए सुझाव देगा. यह संविधान की प्रस्तावना में उल्लिखित निर्देशक सिद्धांतों को लागू करने के लिए आवश्यक कानूनों का भी सुझाव देगा.
• यह गरीब लोगों की सेवा में कानून और कानूनी प्रक्रियाओं का उपयोग करने के लिए सभी आवश्यक उपाय करेगा.

इस आयोग में एक पूर्णकालिक अध्यक्ष, चार पूर्णकालिक सदस्य (सदस्य सचिव सहित) एवं पदेन सदस्य के रूप में विधि मंत्रालय के विधायी विभाग सचिव पदेन सदस्य के रूप में होंगे. इसमें अधिकतम पांच अंशकालिक सदस्य भी होंगे. आम तौर पर सुप्रीम कोर्ट के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश अथवा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश आयोग की अगुवाई करते हैं.
पृष्ठभूमि

भारतीय विधि आयोग, भारत सरकार द्वारा समय-समय पर गठित एक गैर-सांविधिक निकाय है. भारतीय विधि आयोग का मूल रूप से साल 1955 में गठन किया गया था. इस आयोग का प्रत्येक तीन साल के लिए पुनर्गठन किया जाता है. 21वें भारतीय विधि आयोग का कार्यकाल 31 अगस्त 2018 तक था. विभिन्न विधि आयोग प्रगतिशील विकास एवं देश के कानून के संहिताकरण के बारे में अहम योगदान देने में समर्थ रहे हैं. अभी तक विधि आयोग ने 277 रिपोर्ट प्रस्तुत की हैं.

Cut-Copy-Paste’ फंक्शन लाने वाले कंप्यूटर साइंटिस्ट लैरी टेस्लर का निधन


कट, कॉपी, पेस्ट यूजर इंटरफेस के जनक लैरी टेस्लर का हाल ही में निधन हो गया है. वे 74 साल के थे. उनका यह योगदान काफी अहम है. इनके ही योगदान से लोग कंट्रोल सी (Ctrl+C) और कंट्रोल वी (Ctrl+V) का प्रयोग करना समझा था. वे मोडलेस कंप्यूटिंग को लेकर काफी जुनूनी थे.

उन्हें जेरॉक्स पालो ऑल्टो रिसर्च सेंटर में काम करते हुए 'कट, कॉपी, पेस्ट' का विचार आया था. उन्होंने यहां काम करने के बाद एप्पल में काम करना शुरू किया था. लैरी टेस्‍लर ने 1960 के दशक में ऐसे समय कंप्‍यूटर की दुनिया में काम शुरू किया था जब कंप्‍यूटर के बारे में ज्‍यादा लोगों को जानकारी नहीं थी.

कंट्रोल सी (Ctrl+C) और कंट्रोल वी (Ctrl+V) क्या है?

कंप्यूटर या स्मार्टफोन में जब हमें कोई जानकारी कॉपी करना होता है तो हम उसे सलेक्ट (चयन) करने के बाद Ctrl के साथ C का कमांड क्लिक करते हैं. इसके बाद इसी जानकारी को कहीं और प्लेस करने के लिए Ctrl के साथ V का कमांड क्लिक किया जाता है. कंप्यूटर या स्मार्टफोन पर काम के दौरान इन दोनों कमांड का हमेशा प्रयोग होता है.
• लैरी टेस्लर ने करियर के शुरुआती दिनों में काफी समय जेरॉक्स कंपनी में बिताया था. उसके बाद उन्होंने एप्पल में काम करना शुरू किया था. उन्होंने एप्पल के एडवांस्ड टेक्नोलॉजी ग्रुप में वाइस प्रेसिडेंट पद पर रहते हुए कई इंटरफेस बनाए थे.

• उन्होंने साल 1997 में एप्पल का साथ छोड़ दिया था. उन्होंने एप्पल छोड़ने के बाद शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े और कुछ दिन अमेजन और याहू के लिए भी काम किया था. उन्होंने अपने जीवन में जिन-जिन कंपनियों में काम किया वे आज विश्वभर में अपनी अलग पहचान बना चुकी हैं

श्री रामायण एक्समप्रेस: जानिए ट्रेन से जुड़ी खास बातें


भगवान राम से जुड़े स्थलों की तीर्थ यात्रा पर जाने के इच्छुक लोगों हेतु रेलवे 28 मार्च से विशेष पर्यटक ट्रेन चलाएगा. भारतीय रेलवे खानपान एवं पर्यटन निगम (आईआरसीटीसी) ने हाल ही में 28 मार्च से एक विशेष ट्रेन 'श्री रामायण एक्सप्रेस' चलाने की घोषणा की है.

'श्री रामायण एक्सप्रेस' में दस कोच होंगे जिसमें पांच स्लीपर क्लास के गैर-वातानूकूलित कोच और पांच एसी के 3-टीयर कोच होंगे. यह ट्रेन भगवान राम से जुड़े सभी तीर्थ स्थलों को कवर करेगी. आईआरसीटीसी के मुताबिक बुकिंग पूरी तरह से पहले आओ पहले पाओ के अनुसार होगी. यह ट्रेन 28 मार्च 2020 को सफदरजंग रेलवे स्टेशन (नई दिल्ली) से अपनी यात्रा शुरू करेगी.

श्री रामायण एक्सप्रेस का रूट

‘श्री रामायण एक्‍सप्रेस' की यात्रा में अयोध्या में राम जन्मभूमि तथा हनुमान गढ़ी, नंदीग्राम में भारत मंदिर, सीतामढ़ी (बिहार) में सीता माता मंदिर, जनकपुर (नेपाल), वाराणसी में तुलसी मानस मंदिर और संकट मोचन मंदिर, सीतामढ़ी (उत्तर प्रदेश) में सीतामढ़ी स्थल, प्रयाग में त्रिवेणी संगम, हनुमान मंदिर और भारद्वाज आश्रम, श्रृंगवेरपुर में श्रृंगी ऋषि मंदिर, चित्रकूट में रामघाट और सती अनुसुइया मंदिर, नासिक में पंचवटी, हंपी में अंजनाद्री हिल एवं रामेश्वरम में ज्योतिर्लिंग शिव मंदिर शामिल हैं.
भारत का रामायण सर्किट

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इसका किराया स्‍लीपर क्लास में प्रति व्‍यक्ति 16,065 रुपये होगा, जबकि वातानुकूलित श्रेणी में प्रति व्यक्ति किराया 26,775 रुपये होगा. इस यात्रा के अंतर्गत इच्‍छुक पर्यटक श्रीलंका में भगवान राम से जुड़े पर्यटन स्‍थलों का भी दौरा कर सकते हैं. अगर यात्री श्रीलंका जाना चाहते हैं तो उन्हें अतिरिक्त शुल्क देना होगा. यात्री चेन्नई से कोलंबो के लिए उड़ान भर सकते हैं. श्रीलंका में 'रामायण सर्किट' के दर्शन के इच्‍छुक पर्यटकों से प्रति व्यक्ति 37,800 रुपये का अतिरिक्त शुल्क लिया जाएगा.

Rudraksh Tripathi @Rudragofficial

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